पूजा, जप या पाठ पूरा होने के बाद सीधे उठ जाना कई बार मन को अधूरा-सा अनुभव कराता है। कारण यह है कि आसन केवल बैठने की जगह नहीं होता, वह साधना का छोटा-सा पवित्र क्षेत्र बन जाता है। इसलिए आसन छोड़ने का मंत्र और सही विधि साधक को शांत भाव से पूजा पूर्ण करने में सहायता देती है।
श्री राज महाजन जी की भक्तिमय शैली में समझें तो पूजा का अंत भी पूजा जितना ही सुंदर होना चाहिए। जैसे आरंभ में श्रद्धा होती है, वैसे ही अंत में कृतज्ञता, समर्पण और विनम्रता होनी चाहिए।
आसन छोड़ने का सरल मंत्र
आसन से उठने से पहले दोनों हाथ जोड़कर शांत मन से यह भाव बोलें:
ॐ तत्सत् श्रीरामार्पणमस्तु।
इसका भाव है: हे प्रभु, आज की पूजा, जप, पाठ, ध्यान और जो भी शुभ कर्म हुआ, वह सब आपके चरणों में समर्पित है। यह छोटा मंत्र मन को अहंकार से बचाता है और पूजा को फल-लालसा से उठाकर समर्पण में ले जाता है।
यदि आपके घर में गुरु-परंपरा से कोई विशेष मंत्र चलता है, तो उसी मंत्र को श्रद्धा से अपनाएं। मंत्र की शक्ति शब्दों के साथ-साथ भाव, नियम और विश्वास से जागती है।
आसन से उठने की सही विधि
- पूजा पूर्ण होने पर एक-दो क्षण आंखें बंद रखें।
- भगवान, गुरु और अपने इष्ट का मन ही मन धन्यवाद करें।
- ऊपर दिया गया मंत्र एक बार या तीन बार बोलें।
- दाएं हाथ से आसन को स्पर्श करें और प्रणाम का भाव रखें।
- फिर धीरे से उठें; झटके से उठने से साधना का भाव टूटता है।
पूजा की सूक्ष्मता समझनी हो तो हनुमान चालीसा किस दिशा में पढ़ें वाला लेख भी पढ़ सकते हैं। वहां दिशा, आसन और भाव की सरल चर्चा है।
आसन के नीचे जल छोड़ने का भाव
कई घरों में पूजा के बाद आसन के नीचे थोड़ा जल छोड़ने की परंपरा है। इसका भाव यह है कि पूजा से बनी पवित्रता धरती माता को समर्पित हो और साधक का मन स्थिर रहे। यह कोई दिखावा नहीं, बल्कि विनम्रता की क्रिया है।
जल छोड़ते समय मन में कहें: “हे धरती माता, हे प्रभु, मेरी पूजा स्वीकार हो। मेरे मन, वचन और कर्म में पवित्रता बनी रहे।” यदि जल उपलब्ध न हो तो हाथ जोड़कर मन से यही भाव कर लेना भी सुंदर है।
आसन को कैसे रखें?
पूजा के बाद आसन को पैरों से न खींचें। उसे हाथ से उठाकर स्वच्छ स्थान पर रखें। यदि आसन कपड़े का है तो मोड़कर रखें। कुश, ऊन या चटाई वाला आसन हो तो उसे साफ और सूखा रखें। जिस आसन पर रोज जप होता है, उसे सामान्य बैठने के काम में न लें। ऐसा करने से मन में उस आसन के प्रति आदर बना रहता है।
दीपक, दिशा और पूजा की मर्यादा समझने के लिए पूजा करते समय दीपक किस तरफ रखना चाहिए लेख उपयोगी रहेगा।
कब विशेष ध्यान रखना चाहिए?
यदि आपने लंबा जप, सुंदरकांड, रामचरितमानस पाठ, हनुमान चालीसा या कोई संकल्प पूजा की है, तो आसन छोड़ते समय जल्दबाजी न करें। ऐसे समय पूजा के अंत में क्षमा-भाव भी रखें: “हे प्रभु, जाने-अनजाने हुई भूलों को क्षमा करें और मुझे सत्कर्म की दिशा दें।”
यह भाव साधना को कठोर नियम नहीं बनाता; यह साधना को प्रेममय बनाता है। पूजा में भय नहीं, श्रद्धा होनी चाहिए। नियम मन को बांधने के लिए नहीं, मन को भगवान से जोड़ने के लिए होते हैं।
आसन छोड़ने का आध्यात्मिक अर्थ
आसन छोड़ना केवल शरीर का उठना नहीं है। यह भीतर से कहना है कि अब पूजा का भाव जीवन में लेकर जाना है। यदि पूजा के बाद भी वाणी मधुर रहे, मन शांत रहे और कर्म सेवा से जुड़े रहें, तभी पूजा का वास्तविक प्रसाद मिलता है।
रामचरितमानस की साधना को गहराई से अपनाना चाहते हैं तो रामचरितमानस की सिद्ध चौपाइयों से जीवन की साधना वाला मार्गदर्शन देखें। यह साधना को घर-परिवार के जीवन से जोड़ने में सहायक है।
त्वरित नियम
- पूजा पूरी होते ही तुरंत न उठें; पहले शांत होकर समर्पण करें।
- “ॐ तत्सत् श्रीरामार्पणमस्तु” बोलकर पूजा प्रभु को अर्पित करें।
- आसन को पैर से न खींचें; हाथ से उठाकर स्वच्छ स्थान पर रखें।
- जल छोड़ने की परंपरा हो तो श्रद्धा से करें, दिखावे के लिए नहीं।
छोटे प्रश्न
क्या आसन छोड़ने का मंत्र रोज बोलना चाहिए?
हाँ, रोज की छोटी पूजा में भी यह मंत्र बोला जा सकता है। इससे पूजा का अंत शांत और समर्पित भाव से होता है।
क्या बिना जल छोड़े आसन छोड़ा जा सकता है?
हाँ, यदि जल उपलब्ध न हो तो मन से प्रार्थना करके भी आसन छोड़ा जा सकता है। मुख्य बात श्रद्धा और मर्यादा है।
क्या यही मंत्र जप और पाठ के बाद भी बोल सकते हैं?
हाँ, जप, पाठ, हनुमान चालीसा या रामचरितमानस पाठ के बाद भी “ॐ तत्सत् श्रीरामार्पणमस्तु” बोलना शुभ समर्पण का भाव जगाता है।
अंतिम भाव
आसन छोड़ने का मंत्र छोटा हो सकता है, पर उसका भाव बहुत बड़ा है। “ॐ तत्सत् श्रीरामार्पणमस्तु” बोलकर जब साधक उठता है, तो वह अपनी पूजा को प्रभु के चरणों में रख देता है। यही समर्पण पूजा की पूर्णता है।
हर दिन पूजा के अंत में यह छोटा नियम अपनाएं। धीरे-धीरे मन में शांति, नियमितता और भगवान से निकटता का अनुभव बढ़ेगा।





